Emperor Ashoka, The First Constitution Maker of World
Thursday, April 2, 2015
Tuesday, January 20, 2015
जगतसम्राट अशोककी जयंती बड़े ही जोश के साथ मनाई जाये
जगतसम्राट अशोककी जयंती बड़े ही जोश के साथ मनाई जाये
चैत्र शुक्ल अष्टमी (सन २०१६ में १४ अप्रैल, यह तारीख प्रतिवर्ष तिथि नुसार बदलेगी)
भारतीय लोगों के मस्तिष्क से सम्राट अशोक को बड़ी ही चतुराई और चालाकी से ब्राह्मणों ने
भुला दिया है. बौद्ध धर्म अर्थात 'समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय' की
शासन पद्धती अर्थात मानवकल्याण की समाज व्यवस्था नष्ट करने के लिए ब्राह्मणों को
अशोक की यादें नष्ट करना बेहद जरुरी था. इस उद्देश्य पूर्ति के लिए उन्होंने अशोक
से संबंधित दिनों को कल्पनिक राम के उत्सवों में तब्दील कर दिया. अशोक ने जिस दिन
धम्मदीक्षा ली उस विजयादशमी को राम के दशहरा में बदल दिया और समाट अशोक के जन्म
दिन को ब्राह्मणों ने रामजन्म दिन के रूप में परिवर्तित कर दिया. ये दोनों दिन
केवल भारत ही नहीं तो दुनिया के सारे देशों के इतिहास में बहुत ही महत्वपूर्ण है.
अगर सम्राट अशोक ने बौद्ध धम्म की दीक्षा नहीं ली होती तो शायद आज दुनिया में बौद्ध
धम्म नहीं दिखाई पड़ता. और उससे भी आगे दुनिया में "समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व
और न्याय" का अस्तित्व नहीं दिखाई देता, ऐसा कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी.
सम्राट अशोक ने बौद्ध धम्म की दीक्षा लेने के बाद सारी
दुनिया में विद्वान् भिक्खु भेजे थे. उन्होंने उस उस देश की स्थानिक भाषा में
बुद्ध के तत्व पत्थरों में खुदवाए और बुद्ध स्तूपों की निर्मिती की. जापान, चायना,
रशिया, श्रीलंका, इंडोनेशिया, अरब, आफ्रिका, यूरोप, अमेरिका इन सारे देशों में बुद्ध
और उनके विचार फैलाने का श्रेय केवल अशोक और केवल अशोक को ही जाता है. भूमध्य सागर
के परिसर में बुद्ध के विचारों पर आधारित यहूदी धर्म की स्थापना मोजेस ने ई.पू.
१८० में की. उनकी समाधी कश्मीर में पाई गयी. उसी प्रकार यहूदी धर्म में जन्में
जीसस भारत में बौद्ध लामा के स्वरुप में रहे और उनकी समाधी भी कश्मीर में पाई गई. हिब्रू
भाषा में लिखे 'ओल्ड सी स्क्रॉल' बौद्ध भिक्षुओं द्वारा लिखे गए बौद्ध प्रवचन है.
जीसस के पांचसौ साल बाद, लाल समुद्र के किनारे अरब में जन्में मुहम्मद ने फिर से
बुद्ध विचारों पर आधारित इस्लाम की स्थापना की. इसलिए बायबल और कुरान इन दोनों
ग्रंथों के मूलतत्व 'दस आज्ञाएँ' में पंचशील का क्रम ज्यों का त्यों है. जग में
बुद्ध की पहली मूर्ति अरब देश के लोगों ने बनाई, जो पहले बौद्ध ही थे लेकिन आज वे
मुस्लिम है. आफ्रिकन लोगों की काल्पनिक धारणा है कि बुद्ध आफ्रिकन थे, क्योंकि
बुद्ध के सिर के बालों की रचना आफ्रिकन लोगों के जैसी ही है. आज क्रिश्चन या
इस्लाम का स्वरुप कुछ भी हो लेकिन उनका मूल बुद्ध तत्व पर ही आधारित है, इसके सबूत
आज बड़े पैमाने पर उपलब्ध है.
सम्राट अशोक का चारसिंहों वाला स्तंभ चायना, जापान, रशिया,
ऑस्ट्रेलिया इन सभी देशों में दिखाई देता है. पाली नाम के गाँव या शहर भारत में कई
जगहों पर फैले हुए है, जो कि अशोककालीन शिक्षा केंद्र हुआ करते थे. अगर अशोक ना
होते तो बौद्ध धर्म बिहार और उत्तर प्रदेश के बाहर नहीं जा पाता. भारत में
त्रिपिटक तो ब्राहमणों ने जला दिए थे लेकिन वे श्रीलंका में से भारत वापस आये. उसका
श्रेय भी अशोक को ही जाता है. उन्होंने अगर पत्थरों पर शिलालेख खुदवाये नहीं होते,
तो अंग्रजों ने भारत में आकर फिर से बुद्ध धम्म पर किताबें नहीं लिखी होती, और
बाबासाहेब को भी शायद बौद्ध धम्म और उनका इतिहास और उनके वचनों की जानकारी नहीं हो
पाती. ऐसे महान जगतसम्राट की जयंती भारत में नहीं मनाई जाती, यह बड़ी ही शर्म और
दुःख की बात है. सन २०११ में चायना में भारत के परराष्ट्र मंत्री एस एम् कृष्णा की
उपस्थिति में अशोक जयंती मनाई गई. वह अप्रैल महीने की १२ तारीख थी. तब से
महाराष्ट्र के कुछ लोग १२ अप्रैल को ही अशोक जयंती मनाने लगे थे. इसलिए यह तारीख गलत है.
लेकिन अशोक जयंती
मनाने का एक संवैधानिक उद्देश होना चाहिए. इस देश के हर नागरिक को काल्पनिक राजाओं
की कथाओं से बाहर निकालकर, फिर से समता, स्वतंत्रता, बंधुता और न्याय इन तत्वों की
पहचान कराना जरुरी है. बुद्ध तत्व केवल बौद्धों की जागीर नहीं. उसपर इस धरा के सभी
जीवितों का अधिकार है. बौद्धों ने इस सच्चाई को ध्यान में रखकर सारे जगत को अशोक
की पहचान करवानी होगी.
भारत देश की
पहचान १२वी सदी तक 'प्रबुद्ध भारत' इसी स्वरुप में थी. भारत के हिन्दू देशवासियों
को इस तथ्य से अवगत कराना होगा कि इस देश को फिर से 'प्रबुद्ध भारत' बनाने का सपना
स्वामी विवेकानंद ने भी देखा था. उन्होंने इस अभियान की शुरुवात १८९२ में भारत की
'आर्थिक राजधानी' मुंबई में स्थित कान्हेरी बुद्ध गुफा के विश्वविद्यालय से की थी.
वे अनागरिक धम्मपाल के शिष्य बन गए थे और बौद्ध धम्म की दीक्षा भी ली थी. किसी भी
देश की आर्थिक प्रगति, पुल, इमारतों की निर्मिती और तंत्रज्ञान के विकास का सीधा
संबंध बौद्ध सिद्धांतो से है. अशोक के साम्राज्य में जाति विरहित, नैतिक शिलसंपन्न
गुणों से परिपूर्ण ऐसा समाज था, जिसका सामाजिक विकास दर ९२% था, जिसे आज 'मानवी
विकास दर' (Human Development Index) कहा जाता है. साथ ही दुनिया के अन्य देशों
में आर्थिक निवेश ६५% था. सामाजिक और आर्थिक विषमता नहीं के बराबर थी और प्राचीन
प्रबुद्ध भारत का साम्राज्य जागतिक (Global) महाशक्ति था. ब्राह्मणों ने अशोक महान
के इसी साम्राज्य को 'रामराज्य' कहा है.
सम्राट अशोक
द्वारा किये गए मानव और राष्ट्र निर्मिती के आदर्श को याद रखकर प्रतिवर्ष
"चैत्र शुक्ल अष्टमी" को बड़ी संख्या में अखंड प्रबुद्ध भारत के
साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र में, लोग एक उत्सव का आयोजन करते थे. फाहियान जब
भारत आया था तब उसने खुद यह उत्सव देखा था. सम्राट अशोकने सारी दुनिया में बुद्ध
के समता, स्वतंत्रता, बंधुता और न्याय के महान संदेशों को ८४००० स्तूपों के रूप
में अमेरिका से जापान, इंग्लैंड से आफ्रिका, सभी जगह प्रस्थापित किये थे,
शिलालेखों पर खुदवाया और इस प्रकार वह जगत का सर्वप्रथम संविधान निर्माता कहलाया. दुनिया
में सभी ओर फैले संदेशों के आधार पर ही इंग्लैंड ने १२१५ में उनका संविधान मग्ना
कार्टा (महान संविधान) बनाया, अमेरिका के यूनाइटेड देशों ने १७८७ में उनका संविधान
बनाया और अंत में १९४९ में जगत का सबसे विशाल संविधान भारत देश का बना. इन सभी
संविधानों में बुद्धसंदेशों के मूलतत्व 'समता, स्वंतंत्रता, बंधुता और न्याय' का
मुख्य रूप से उल्लेख है. इतना ही नहीं तो दुनिया में शांतता और न्याय-निवारण के
लिए सभी देशों ने संयुक्त रूप से तयार किये गए "संयुक्त राष्ट्र संघ"
(UNO) में दुनिया के २९५ देशों में से १९८ देश शामिल है. इस संघटन ने १० दिसंबर, १९१८
को स्वीकार किये 'मानव अधिकार का संयुक्त जाहीरनामा', United Declaration of Human
Rights" (UDHR) की उद्देशिका में भी बुद्ध के मानवी मूल्य प्रमुखता से अंकित
है. इसका श्रेय अशोक को ही जाता है. इसलिए ऐसे महान राजा की जागतिक स्वरूप की जयंती
मनाकर उसके अमूल्य कार्य को याद करना सभी का फर्ज है.
अशोक जयंती
"चैत्र शुक्ल अष्टमी" अर्थात तिथि के दिनही मनाई जानी चाहिये, जैसे किबुद्धजयंती तिथि के अनुसार ही मनाई जाती है. तिथिनुसार
कार्यक्रम मनाने के लिए कुछ लोग विरोध करते है कि तिथियाँ ब्राह्मणों की देन है.
इस विषय में हमें जानना होगा कि तिथि और कालगणना ब्राह्मण या वैदिकों की देन नहीं
है बल्कि यह भारत के विद्वान् भिक्खुओं ने निर्माण की है, जिसके लिए मिस्त्र के
खगोलशास्त्र की भी मदत ली गई होगी ऐसा जान पड़ता है. भारत का कैलेन्डर जिसे हिन्दू
कैलेन्डर समझा जाता है, वह हिन्दू कैलेन्डर न होकर बौद्ध कैलेन्डर ही है. इसका
सबूत मैंने अपने महाशिवरात्रि के बारे में लिखे लेख में दिया है. जिसप्रकार हिन्दू
कहे जाने वाले कैलेन्डर में से ब्राहमण 'अशोक विजयादशमी' गायब नहीं कर पाए,
उसीप्रकार आज भी उस कैलेन्डर में 'चैत्र शुक्ल अष्टमी' को अशोक अष्टमी कहा जाता
है. हिन्दू धर्म यह विकृत बौद्ध धर्म ही है. भारत का तिथि कैलेन्डर यह चंद्रकलाओं
की गणनानुसार चलता है. वह अधिक संयुक्तिक है. आज का अंग्रेजी कैलेन्डर जो सेंट
ग्रेगोरी ने १५८२ में जुलियन (जुलिअस सीज़र के नामसे ई.पू. ४५) कैलेन्डर पर से तयार
किया था. यद्यपि वह कई देशों में माना जाता है, फिर भी दुनिया में सबसे प्राचीन
कैलेन्डर जैसे कि बेबोलियन, कोरियन, असीरियन, चायनीज, मिनगाऊ, जापनीस (प्राचीन हान
कैलेन्डर), बेनजायटिन, ज्यू (हिब्रू कैलेन्डर) इत्यादि, सभी चन्द्र और सूर्य
(पूर्णिमा, अमावस्या दिन) की कालगणना पर ही आधारित है. भले ही, अंग्रेजों ने
दुनिया के कई देशों पर राज किये जाने के कारण उन देशों के शासकीय कामकाज में
ग्रेगोरियन (अंग्रेजी) कैलेन्डर उपयोग में लाया जाता हो, लेकिन भारत के तरह ही उन
देशों में भी रोजमर्रा की दिनचर्या में चन्द्र कालगणना पर आधारित कैलेन्डर को ही
प्रयोग में लाया जाता है.
ब्राह्मणों ने इस देश पर राज करने के लिए भारत के हिन्दू और
बौद्धों में झगडा लगाने में बड़ी चतुराई से सफलता प्राप्त की है. उन्होंने चालाकी
से इस तथ्य को भुला दिया कि भारत के हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई ये सभी बौद्ध ही
थे. इतना ही नहीं तो उन धर्मों में घुसपैठ कर उनके धर्मगुरु के पद भी हासिल कर
लिए. इसलिए इस सत्य को जानिए और 'तिथियों' की गणना का प्रकार वैदिक है, इसे दिमाग
से पूर्णतया हटा दें. ब्राहमणों ने तो भारतीय प्राचीन गणिती पद्धति को भी 'वैदिक
पद्धती' के रूप में प्रसिद्द किया है, जबकि वेदों में ना ही पूर्णिमा, अमावस्या के
कालगणना का उल्लेख है और नाही किसी प्रकार के गणिती ज्ञान का.
करुणा, सत्य, अहिंसा, इन सभी मानवी नैतिक सभ्य संस्कृति के
विचारों को प्रवाहित करने के लिए हमें अशोक जयंती स्वतंत्र रूप से मनानी होगी. जिससे
उसके बेजोड़ उदार और सहिष्णु कार्योंकी पहचान देश के प्रत्येक नागरिक को हो. दुनिया
के किसी भी राजा की शासन प्रणाली अशोक महान के जैसी नहीं थी. जैसे कि उनका यह
आदेश, 'मै चाहे सोया हूँ, घोड़े पर हूँ, खाना खा रहा हूँ, बैठा हूँ, लड़ाई पर हूँ,
किसी भी समय, कोई भी सामान्य व्यक्ति मुझसे मिल सकता है'. उन्होंने मनुष्यों के
लिए ही नहीं तो प्राणियों के लिए भी दवाखाने बनवाये थे. प्राणियों के लिए दवाखाना
खोलने वाला और प्राणीहिंसा बंद करने वाला वह दुनिया का पहला राजा है. रस्ते के
दुतर्फा घनी छाया वाले वृक्ष लगाने के साथ ही पीने के पानी की व्यवस्था उन्होंने
करवाई थी. बिना कोई लड़ाई किये उन्होंने समता, न्याय, प्रेम, बंधुभाव का राज्य पूरी
दुनिया पर कायम किया था. ऐसे पत्रक छापकर जगह जगह बाँटने चाहिए. जिससे लोग इस धरती
पर हुए सच्चे राजा और शासनकर्ता को पहचान सके. ऐसा आवाहन करना चाहिए कि "अशोक
चक्र हमारे राष्ट्र ध्वज पर है, उसकी चार सिंहों की राजमुद्रा हमारे देश की
राजमुद्रा है, उसके प्रशासन पद्धति की छाप भारत पर ही नहीं तो दुनिया के कई देशों
के संविधानो पर है. फिर हम ऐसे महान करुणासागर सम्राट का जन्मदिन क्यों नहीं
मनाते?" ऐसी जानकारी के पत्रक ब्लिस ने तयार किये है. ऐसे पत्रक हम हिन्दू
लोगों के कार्यक्रमों में भी बाँटते है.
उनका जन्मदिन इस देश के महान
राजा के स्वरुप में मनाया जाये. देशवासियों से विनती है कि सम्राट अशोक की जयंती "चैत्र शुक्ल अष्टमी" को ही बड़े ही जोर शोर
से और बाजे गाजे के साथ मनाये. रैली निकाली जाये. देश का राष्ट्रध्वज, चार सिंहों
की मुद्रा और सम्राट अशोक के बड़े बड़े कट आउट लगाये. रैली का स्वरुप बिल्कुल भी
धार्मिक ना हो. भले ही सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया लेकिन उन्होंने
मानव ही नहीं तो सारी कायनात के लिए किये कार्य ज्यादा महत्वपूर्ण है. गंगा नदी की
स्वच्छता का अभियान भी अशोक महान ने अपने कार्यकाल में शुरु किया था, ऐसा
शिलालेखों से ज्ञात हुआ है. रैली में सिर्फ और सिर्फ राष्ट्र ध्वज ही उपयोग में
लाये जाए और केवल देशगौरव के गीत बजाये जाए. विशेषत: रंगबिरंगी कपडे पहनकर, सजधज
कर रैली में शामिल हो. यह देश का राष्ट्रीय त्यौहार लगे. सम्राट अशोक को किसी एक
धर्म का राजा ना प्रदर्शित करते हुए देश में महानतम राजा के स्वरुप में प्रदर्शित
करे. बौद्धों ने अन्य धर्मियों का द्वेष त्यागकर बुद्ध और बाबासाहब को लोगों पर
जबरदस्ती थोपने की अपनी संकुचित वृत्ती को परे रख संपूर्ण जीवितों के कल्याण के
लिए, विचारपूर्वक और संयम से कृतीशील कार्यक्रम अमल करना जरुरी है. इसे ध्यान में
रखना होगा कि ब्राह्मणी षड्यंत्रकारी लोग बौद्धों पर अत्याचार करके उन्हें अन्य
धर्मियों के खिलाफ भड़काकर उनसे अलग करने की साजिश बखूबी नित्य रूप से अमल करते
रहते है, ताकि अन्य धर्मीय और बौद्धों में वैमनस्य बना रहे और बुद्धतत्व प्रचार पर
अंकुश लगा रहे. इस सच को समझकर जयंती का उत्सव संभवत: अन्य धर्मियों के हाथों कार्यान्वित
किया जाये. उसके लिए उन्हें प्रत्यक्ष मिलकर अशोक के इतिहास की जानकारी देनी होगी.
संभव हो तो राजकीय पक्षों को भी, बिना किसी पक्षपात किये शामिल किया जाये. रैली का उद्घाटन शहर के जिल्हाधिकारी, तहसीलदार,
आयुक्त के हातों करें. ध्यान में रखना होगा कि अशोक की जयंती किसी बंद हाल या
मैदान में अन्य महापुरुषों के साथ ना मनाएं. अशोक महान की जयंती स्वतंत्र रैली
निकालकर ही मनाई जाए, अन्यथा बिल्कुल ना मनाये. बाबासाहब ने कहा है, जो इतिहास
भूलता है वह इतिहास नहीं बना सकता. इसलिए इस देश के लोगों को सच्चा इतिहास समझाकर
फिर से जम्बुद्वीप का प्रबुद्ध इतिहास प्रस्थापित करना होगा, जिससे ब्राह्मणी जाल
में फंसे हुए हमारे भारतीय देशवासियों को बाहर निकालकर 'समता, स्वतंत्रता, बंधुता
और न्याय' के प्रेममय मधुर वातावरण में लाया जाए. यह जिम्मेदारी वहन करने की
क्षमता बाबासाहब के अनुयायिओं में है. इसलिए इस राष्ट्रीय त्यौहार की तयारी के लिए
अभी से लग जाईये और अशोक महान का इतिहास इस दुनिया को जताइए.
डॉ परम आनंद,
विहार सेवक, भारत लेणी
संवर्धन समिती (ब्लिस),
८८०५४६०९९९
Wednesday, March 12, 2014
जगत सम्राट अशोक यांची जयंती मोठया जल्लोषात साजरी करा
जगत सम्राट अशोक यांची जयंती मोठया जल्लोषात साजरी करा
चैत्र शुक्ल अष्टमी (सन २०१६ मधे १४ अप्रैल, ही तारीख दर वर्षी बदलेल )
भारतीय लोकांच्या डोक्यातून सम्राट अशोकाला मोठया चतुराई आणि चलाखीने ब्राम्हणांनी
विसरवून दिले आहे, त्यांचा विसर पडलेला
आहे. बौद्ध धर्म म्हणजे ‘समता, स्वतंत्रता, बंधुत्वा, आणि
न्यायाची’ शासन पद्धती किंवा समाज व्यवस्था नष्ट करण्यासाठी ब्राम्हणांना
अशोकाच्या अवशेषांना देखील नष्ट करणे फार आवश्यक होते. त्यातल्या त्यात त्यांनी अशोका संबंधित
कार्यक्रमांना काल्पनिक रामाच्या उत्सवामध्ये बदल केला. सम्राट अशोकाच्या जन्म दिवसाला ब्राम्हणांनी रामजन्म
दिवस म्हणून परिवर्तन केले, आणि अशोकाने ज्या
दिवशी धम्मदिक्षा घेतली त्या विजयादशमी च्या रामाची विजयादशमी म्हणून रुपांतरीत
केले. हे दोन्ही दिवस फक्त भारतातच नाही
तर संपूर्ण देशाच्या इतिहासात फारच महत्वपूर्ण आहेत. जर सम्राट अशोकानी बौद्ध
धम्माची
दिक्षा घेतली नसती तर कदाचित आज जगात बौद्ध धम्म तुम्हाला दिसला नसता. याच्याहि पुढे कदाचित जगात ‘समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व, आणि न्याय’ याचे देखील अस्तित्व दिसले नसते. असे बोलणे वावगे ठरणार नाही.
सम्राट अशोकाने बौद्ध धम्माची
दिक्षा घेतल्यानंतर संपूर्ण जगात विद्वान बौद्ध
भिक्षु पाठविले होते, त्यांनी त्या त्या देशाच्या
स्थानिक भाषेत बुद्धाचे तत्व दगडांमध्ये कोरले आणि बुद्ध स्तुपांची निर्मिती केली.
जपान, चायना, रशिया, श्रीलंका, इंडोनेशिया, अरब, आफ्रिका, युरोप, अमेरिका
या सर्व देशामध्ये बुद्ध आणि त्यांच्या विचारांना ओळखण्याचे श्रेय मात्र अशोक आणि
फक्त अशोकालाच जाते. भूमध्य सागराच्या परिसरात बुद्ध विचारांवर आधारित यहुदी
धर्माची स्थापना मोजेसने ई. पू. १८० मध्ये केली. त्यांची समाधी काश्मीर मध्ये
दिसून आली. त्याच प्रकारे यहुदी धर्मात जन्मलेल्या जीजस हा भारतात बौद्ध लामा च्या
स्वरुपात राहिला. आणि त्यांची समाधी सुद्धा कश्मिर मध्येच मिळाली आहे. हिब्रू
भाषेत लिहिलेले ‘ओल्ड सी स्क्राल’ हे बौद्ध भिक्षुद्वारे लिहिलेले बौद्ध प्रवचन
होय. जीजस च्या पाचशे वर्षानंतर लाल समुद्राच्या काठावर अरब मध्ये जन्मलेल्या
मोहम्मदने पुन्हा बौद्ध विचाराच्या आधारावर इस्लामची स्थापना केली. म्हणून बायबल
आणि कुरान या दोन्ही ग्रंथांचे मुल तत्व ‘दहा आज्ञा’ मध्ये पंचशिलेचा क्रम जसा चा तसा
आहे. जगात बुद्धाची पहिली मूर्ती अरब देशातील लोकांनी बनवलेली आहे, जे पूर्वी बौद्धाच होते
मात्र आज ते मुस्लिम आहेत. आफ्रिकन लोकांची काल्पनिक धारणा आहे की बुद्ध हे
आफ्रीकेचेच होते, कारण बुद्धाच्या
डोक्यावरील केसांची रचना आफ्रिकन लोकांसारखी आहे. आज ख्रिश्चन किंवा इस्लामचे
स्वरूप काहीही असो मात्र त्यांचे मूळ हे बुद्ध तत्वावर आधारित आहे, याचे पुरावे आज बऱ्याच
प्रमाणात उपलब्ध आहेत.
सम्राट अशोकाचा चार सिंहाचा
स्तंभ चायना, जपान, रशिया, ओस्ट्रेलिया या सर्व देशात
पाहायला मिळतो. पाली नावाचे गाव किंवा शहर भारतात बऱ्याच ठिकाणी पसरलेले आहेत, जे की अशोकाचे प्रशासन
केंद्र होते. जर अशोक नसते तर बौद्ध धर्म बिहार आणि उत्तरप्रदेशाच्या बाहेर गेले
नसते. भारतात त्रिपिटक तर ब्राहामांनी जाळून टाकले होते. परंतु ते श्रीलंकेतून
भारतात परत आले, त्याचे श्रेय सुद्धा अशोकालाच. त्याने जर दगडांवर शिलालेख कोरले
नसते तर, इंग्रजांनी भारतात येऊन परत बुद्ध धम्मावर
पुस्तके लिहिली नसती, आणि बाबसाहेबाना पण
कदाचित बौद्ध धम्म आणि त्याचा इतिहास आणि त्याच्या वचनांची माहिती झाली नसती. अशा
महान जगत सम्राटाची जयंती भारतात साजरी केल्या जात नाही, ही मोठी लाजेची आणि खंताची बाब आहे. चायनातील लोक प्रत्येक वर्षी
ही जयंती साजरी करतात. सन २०१० मध्ये चायनाच्या मदतीने दिल्ली येथे परराष्ट्र
मंत्री एस. एम. क्रिष्णा यांच्या उपस्थिती मध्ये साजरी करण्यात आली. त्या दिवशी एप्रिल महिन्याची १२ तारीख होती. तेव्हा
पासून महाराष्ट्रात काही लोक १२ एप्रिल या दिवशीच अशोक जयंती साजरी करतात. मात्र
अशोक जयंती मनाविण्याचा उदेश्य असायला हवा. या देशातील प्रत्येक धर्माच्या लोकांना
काल्पनिक राजाच्या कथेतून बाहेर काढून, परत समता, स्वतंत्रता, बंधुता
आणि न्याय या तत्वांची ओळख होने फार गरजेचे आहे. बुद्ध तत्व हे फक्त बौद्धांची
मालमत्ता नाही. ती या जमिनीवरील प्रत्येक जीविताची आहे. बौद्धांनी आपल्या बुद्धत्वाचे भान ठेऊन, संपूर्ण जगाला अशोकाची ओळख करून द्यावी लागेल.
भारत देशाची ओळख ही १२व्या
शतका पर्यंत ‘प्रबुद्ध भारत’ या रूपातच होती. भारतातील हिंदू देशवासियांना हे अवगत
करून द्यायला हवे की या देशाला परत ‘प्रबुद्ध भारत’ बनविण्याचे स्वप्न स्वामी
विवेकानंद यांनी देखील बघितले होते. ज्याने या अभियानाची सुरवात १८९२ मध्ये
भारताची “आर्थिक राजधानी” मुंबई येथील कान्हेरी गुंफेच्या विश्वविद्यालयातून सुरु
केली होती. ज्याने अनागरिक धम्मपाल यांचा शिष्य बनून बौद्ध धम्माची दीक्षा घेतली
होती. देशाची आर्थिक प्रगती, पुल, इमारतींची निर्मिती आणि तंत्रज्ञानाच्या
जोपासनेचे सरळ संबंध बौद्ध सिध्न्तांशी आहेत. अशोकाच्या साम्राज्यात जातीरहित, नैतिक, शिलसंपन्न गुणांचा सामाजिक विकास ९२% होता. जगातील
इतर देशांमध्ये आर्थिक गुंतवणुकीचा विकास ६५% होता. सामाजिक आणि आर्थिक विषमता नाही च्या बरोबर होती.
आणि प्राचीन प्रबुद्ध भारताचे साम्राज्य जागतिक (ग्लोबल) महाशक्ती होते.
सम्राट अशोकाद्वारे मानव
आणि राष्ट्र, निर्मितीच्या आदर्शाला आठवणीत ठेऊन प्रत्येक
वर्षी “चैत्र शुक्ल अष्टमी “ ला मोठया संखेत अखंड प्रबुद्ध भारताच्या साम्राज्याची
राजधानी पाटलीपुत्र येते लोक उत्सवाचे आयोजन करीत असत. फाहीयान जेव्हा भारतात आला, तेव्हा त्याने हा उत्सव स्वत बघितला होता. सम्राट
अशोकाने संपूर्ण जगात या महान संदेशाला ८४०००
स्तूपाच्या रुपामध्ये अमेरिका ते जपान, इंग्लड
ते आफ्रिका, या सर्व जागी
प्रस्थापित केले. सम्राट अशोकाने त्या
महान बुद्धच्या समता, स्वतंत्रता, बंधुत्वा, आणि
न्याय या संदेशाला शिलालेखावर कोरले आणि या प्रकारे ते जगात प्रथम संविधान
निर्माता म्हणून ओळखल्या गेलेत. जगात सर्वत्र पसरलेल्या संविधानाच्या संदेशावर
आधारित इंग्लड ने १२१५ मध्ये त्यांचे संविधान मग्ना कोर्टा ( महान संविधान) बनविले
आणि अमेरिकेच्या युनाईटेड देशाने १७८७ मध्ये आपला संविधान बनविला. या सर्व
संविधानात बुद्धाचे मूळतत्व ‘समता, न्याय, बंधुत्व, आणि स्वतंत्रता’ यांचे मुख्यतया उल्लेख आहे.
अशोक जयंती ही “चैत्र शुक्ल
अष्टमी” म्हणजेच तिथी च्या दिवशीच साजरी करायला पाहिजे, ज्या प्रमाणे आम्ही सर्व
बुद्ध जयंती तिथी प्रमाणे साजरी करतो. आम्हाला हे माहिती पाहिजे की तिथी आणि
कालगणना ब्राम्हण वा वैदिकांची देन नाही. मूलतः हे भारतातील विद्वान बौद्ध भिक्षूंनी
निर्माण केलेली आहे, जे की मिस्त्र च्या खगोल शास्त्रीयाकडून घेतले गेले आहे. भारताचे
कॅलेन्डर ज्याला की हिंदू कॅलेन्डर समजल्या जाते, ते हिंदू कॅलेन्डर नसून बौद्ध
कॅलेन्डरच आहे. या सत्याचा पुरावा मी माझ्या महाशिवरात्री बद्दलच्या मागील लेखात दिला
होता. जसे हिंदू म्हंटल्या जाणऱ्या कॅलेंडर मधून ब्राह्मण ‘अशोक विजयादशमीला’ गायब
करू शकले नव्हते, तसेच आजही त्या कॅलेंडर मध्ये “चैत्र शुक्ल अष्टमी” ला अशोक
अष्टमी म्हंटले जाते. हिंदू धर्म हा विकृत बौद्ध धर्मच आहे. भारताचा तिथी कॅलेन्डर
हा चंद्र्कलेच्या गणने नुसार चालत असतो. तो जास्त संयुक्तिक आहे. आजचे इंग्रजी
कॅलेन्डर जे सेंट. गेग्ररी ने १५८२ मध्ये जुलियन (जुलियस सीजर च्या नावाने ई. पू.
४५) कॅलेन्डर वरून तयार केले होते. जरी ते अर्ध्याअधिक देशांमध्ये मानले जात आहे. तरी, जगात सर्वाधिक प्राचीन कॅलेन्डर
जसे की बेबिलोनियान, कोरियन, असिरीयान, चायनीज, मिनगाऊ, जापनीस (प्राचीन हान कॅलेन्डर), बेनजानटाइन, ज्यू (हिब्र कॅलेन्डर) इत्यादी चंद्र आणि सूर्य
(पोर्णिमा, अमावस्या, दिवस) कालगणनेवर आधारित आहेत. इतकेच नव्हे तर आज
ही भारतात इंग्रजी म्हंटल्या जाणाऱ्या कॅलेन्डर
प्रमाणे जगातल्या कीत्तेक देशांतील शासकीय कामकाजामध्ये गग्रोरीयान (ईग्रजी)
कॅलेन्डर वापरात आणले जाते, परंतु आज ही दररोजच्या काजकामासाठी चंद्रकाळ गणनेवर आधारित
कॅलेंडरचाच उपयोग केल्या जातो. याचे मूळ कारण हे आहे की इंग्रजांनी जगातील बहुतांश
देशावर राज्य केले आहे.
ब्राम्हणांनी या देशावर
राज्य करण्यासाठी भारतातील हिंदू आणि बौद्धा मध्ये भांडणे लावण्यात मोठ्या
चालाखीने यश मिळवले. ब्राम्हणांनी मोठ्या हुशारीने लोकांना याचा विसर पाडून दिला
आहे की हिंदू, मुस्लीम, सिख, इसाई, हे सर्वच पूर्वी बौद्ध होते.
आणि ब्राम्हणांनी सर्व धर्मामध्ये मुख्य धर्मगुरु स्वतःला करून घेतले. या सत्याला
जाना आणी आपल्या डोक्यातून ‘तिथी’ या वैदिक आहेत हा गैरसमज काढून टाका. करूणा, सत्य, अहिंसा या सर्व बौद्ध नैतिक सभ्य संस्कृतीच्या विचारांना
प्रवाहित करण्यासाठी आम्हाला अशोक जयंती ही स्वतंत्र रुपात साजरी करायला हवी. जेणे
करून त्याच्या बेजोळ उदार आणि सहिष्णू कामांची ओळख देशातील प्रत्येक नागरिकाला होईल.
जे जगात कुठल्याच राजा ने केले नाही, जसे की
त्याचा एक आदेश होता की “मी जरी झोपलो असलो, घोड्यावर असलो, जेवत असलो, बसून असलो, चालत असलो, लढाईत असलो, तरी कुठल्याही वेळी कुठलाही
सामान्य व्यक्ती मला भेटू शकतो.” त्याने मनुष्यासाठीच नव्हे तर प्राण्यांसाठी
देखील दवाखाने बनविले होते, रस्त्याच्या दोन्ही कडेला घनदाट झाडे लावली होती, त्याच बरोबर पाण्याची देखील व्यवस्था केली होती.
असे पत्रक छापून वाटायला हवेत. जेणे करून अशोकाच्या प्रती मनात श्रद्धा आणि आपुलकी
निर्माण होईल. असे आव्हाहन करायला हवे की “अशोक चक्र आमच्या राष्ट्रध्वजावर आहे, त्याची
चार सिन्हांची राजमुद्रा आपली देशाची राजमुद्रा आहे, त्याच्या प्रशासन पद्धतीचा ठसा फक्त आमच्यावरच
नाही तर, देशाच्या संविधानावर
पण आहे. परंतु अश्या करुणासागर जगत सम्राटाचा जन्मदिवस आपण का साजरा करीत नाही ?”
असे पत्रक ब्लिस आणि मैत्रेय संघाने तयार केले आहेत. हे पत्रक आम्ही हिंदू
लोकांच्या कार्यक्रमात देखील वाटत असतो.
त्याचा जन्मदिवस या
देशाच्या महान राजा च्या स्वरुपात मनवावा. देशवासियांना विनंती आहे की सम्राट अशोकाची जयंती “चैत्र शुक्ल अष्टमी” लाच मोठ्या जल्लोषात
आणि वाजत गाजत मनवावी. मिरवणूक काढावी. देशाचा राष्ट्र ध्वज, चार सिंहांची मुद्रा आणि सम्राट अशोकाचे मोठमोठे
कट आउट लावावे. मिरवणुकीत राष्ट्रध्वजा
सहित फक्त आणि फक्त देश गौरवाची गाणी वाजवावीत. विशेषतः रंगबिरंगी कपडे आणि
नटूनथटून मिरवणुकीत शामिल व्हावे. हा भारत देशाचा राष्ट्रीय सन वाटावा. सम्राट
अशोकाला कुठल्याही एका धर्माचा राजा न दर्शविता देशाच्या महानतम राजाच्या स्वरुपात
प्रदर्शित करावे. बौद्धांनी अन्य धर्मियांचा द्वेष त्यागून, बुद्ध आणि बाबासाहेबांना
लोकांवर जबरदस्ती ने थोपन्याची आपली संकुचित वृत्ती त्यागून संपूर्ण जीवित
कल्याणाकरिता विचारपूर्वक आणि संयमाने कृतीशील कार्यक्रम राबविणे गरजेचे आहे. मोठ्या
संयमाने ‘समता, स्वतंत्रता, बंधुता आणि न्याय’च्या
बुद्ध तत्वांना पसरविण्याची जबाबदारी निभवावी लागेल. जयंतीचा उत्सव शक्यतो अन्य
धर्मियांकडून राबवावा. त्यासाठी त्यांना प्रत्यक्ष भेटून माहिती द्यावी लागेल. शक्य
असल्यास राजकीय पक्षांना सुद्धा शामिल करावे. मिरवणुकीचे उद्घाटन शहराचे कलेक्टर, तहसीलदार अथवा आयुक्त यांच्या हातून करावे. बौद्धांनी
लक्षात ठेवणे आवश्यक आहे की अशोकाची जयंती कुठल्या बंद हाल अथवा मैदानात अन्य महापुरुषांसोबत
घेवू नये. अशोकाची जयंती स्वतंत्र मिरवणूक काढूनच मनवावी, अन्यथा बिलकुल मनवू नये. बाबासाहेबांनी
म्हंटले आहे की जो इतिहास विसरतो, ते इतिहास रचू शकत नाही. यासाठी या देशातील लोकांना खरा
इतिहास पटवून पुन्हा जम्बुद्विपाचा प्रबुद्ध इतिहास प्रस्थापित करावा लागेल. जेणेकरून
ब्राहमणी जाळ्या मध्ये अडकलेल्या आमच्या भारतीय देशवासियांना बाहेर काढून ‘समता, स्वतंत्रता, बंधुता
व न्याय’ च्या प्रेममय मधुर वातावरणामध्ये आणले जावे. ही जबाबदारी पेलण्याची ताकत
फक्त आणि फक्त बाबासाहेबांच्या अनुयायांमध्ये आहे.
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