Tuesday, January 20, 2015

जगतसम्राट अशोककी जयंती बड़े ही जोश के साथ मनाई जाये

जगतसम्राट अशोककी जयंती बड़े ही जोश के साथ मनाई जाये
चैत्र शुक्ल अष्टमी (सन २०१६ में १४ अप्रैल, यह तारीख प्रतिवर्ष तिथि नुसार बदलेगी)

भारतीय लोगों के मस्तिष्क से सम्राट अशोक को बड़ी ही चतुराई और चालाकी से ब्राह्मणों ने भुला दिया है. बौद्ध धर्म अर्थात 'समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय' की शासन पद्धती अर्थात मानवकल्याण की समाज व्यवस्था नष्ट करने के लिए ब्राह्मणों को अशोक की यादें नष्ट करना बेहद जरुरी था. इस उद्देश्य पूर्ति के लिए उन्होंने अशोक से संबंधित दिनों को कल्पनिक राम के उत्सवों में तब्दील कर दिया. अशोक ने जिस दिन धम्मदीक्षा ली उस विजयादशमी को राम के दशहरा में बदल दिया और समाट अशोक के जन्म दिन को ब्राह्मणों ने रामजन्म दिन के रूप में परिवर्तित कर दिया. ये दोनों दिन केवल भारत ही नहीं तो दुनिया के सारे देशों के इतिहास में बहुत ही महत्वपूर्ण है. अगर सम्राट अशोक ने बौद्ध धम्म की दीक्षा नहीं ली होती तो शायद आज दुनिया में बौद्ध धम्म नहीं दिखाई पड़ता. और उससे भी आगे दुनिया में "समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय" का अस्तित्व नहीं दिखाई देता, ऐसा कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी.












सम्राट अशोक ने बौद्ध धम्म की दीक्षा लेने के बाद सारी दुनिया में विद्वान् भिक्खु भेजे थे. उन्होंने उस उस देश की स्थानिक भाषा में बुद्ध के तत्व पत्थरों में खुदवाए और बुद्ध स्तूपों की निर्मिती की. जापान, चायना, रशिया, श्रीलंका, इंडोनेशिया, अरब, आफ्रिका, यूरोप, अमेरिका इन सारे देशों में बुद्ध और उनके विचार फैलाने का श्रेय केवल अशोक और केवल अशोक को ही जाता है. भूमध्य सागर के परिसर में बुद्ध के विचारों पर आधारित यहूदी धर्म की स्थापना मोजेस ने ई.पू. १८० में की. उनकी समाधी कश्मीर में पाई गयी. उसी प्रकार यहूदी धर्म में जन्में जीसस भारत में बौद्ध लामा के स्वरुप में रहे और उनकी समाधी भी कश्मीर में पाई गई. हिब्रू भाषा में लिखे 'ओल्ड सी स्क्रॉल' बौद्ध भिक्षुओं द्वारा लिखे गए बौद्ध प्रवचन है. जीसस के पांचसौ साल बाद, लाल समुद्र के किनारे अरब में जन्में मुहम्मद ने फिर से बुद्ध विचारों पर आधारित इस्लाम की स्थापना की. इसलिए बायबल और कुरान इन दोनों ग्रंथों के मूलतत्व 'दस आज्ञाएँ' में पंचशील का क्रम ज्यों का त्यों है. जग में बुद्ध की पहली मूर्ति अरब देश के लोगों ने बनाई, जो पहले बौद्ध ही थे लेकिन आज वे मुस्लिम है. आफ्रिकन लोगों की काल्पनिक धारणा है कि बुद्ध आफ्रिकन थे, क्योंकि बुद्ध के सिर के बालों की रचना आफ्रिकन लोगों के जैसी ही है. आज क्रिश्चन या इस्लाम का स्वरुप कुछ भी हो लेकिन उनका मूल बुद्ध तत्व पर ही आधारित है, इसके सबूत आज बड़े पैमाने पर उपलब्ध है.

       सम्राट अशोक का चारसिंहों वाला स्तंभ चायना, जापान, रशिया, ऑस्ट्रेलिया इन सभी देशों में दिखाई देता है. पाली नाम के गाँव या शहर भारत में कई जगहों पर फैले हुए है, जो कि अशोककालीन शिक्षा केंद्र हुआ करते थे. अगर अशोक ना होते तो बौद्ध धर्म बिहार और उत्तर प्रदेश के बाहर नहीं जा पाता. भारत में त्रिपिटक तो ब्राहमणों ने जला दिए थे लेकिन वे श्रीलंका में से भारत वापस आये. उसका श्रेय भी अशोक को ही जाता है. उन्होंने अगर पत्थरों पर शिलालेख खुदवाये नहीं होते, तो अंग्रजों ने भारत में आकर फिर से बुद्ध धम्म पर किताबें नहीं लिखी होती, और बाबासाहेब को भी शायद बौद्ध धम्म और उनका इतिहास और उनके वचनों की जानकारी नहीं हो पाती. ऐसे महान जगतसम्राट की जयंती भारत में नहीं मनाई जाती, यह बड़ी ही शर्म और दुःख की बात है. सन २०११ में चायना में भारत के परराष्ट्र मंत्री एस एम् कृष्णा की उपस्थिति में अशोक जयंती मनाई गई. वह अप्रैल महीने की १२ तारीख थी. तब से महाराष्ट्र के कुछ लोग १२ अप्रैल को ही अशोक जयंती मनाने लगे थे. इसलिए यह तारीख गलत है.

लेकिन अशोक जयंती मनाने का एक संवैधानिक उद्देश होना चाहिए. इस देश के हर नागरिक को काल्पनिक राजाओं की कथाओं से बाहर निकालकर, फिर से समता, स्वतंत्रता, बंधुता और न्याय इन तत्वों की पहचान कराना जरुरी है. बुद्ध तत्व केवल बौद्धों की जागीर नहीं. उसपर इस धरा के सभी जीवितों का अधिकार है. बौद्धों ने इस सच्चाई को ध्यान में रखकर सारे जगत को अशोक की पहचान करवानी होगी.

भारत देश की पहचान १२वी सदी तक 'प्रबुद्ध भारत' इसी स्वरुप में थी. भारत के हिन्दू देशवासियों को इस तथ्य से अवगत कराना होगा कि इस देश को फिर से 'प्रबुद्ध भारत' बनाने का सपना स्वामी विवेकानंद ने भी देखा था. उन्होंने इस अभियान की शुरुवात १८९२ में भारत की 'आर्थिक राजधानी' मुंबई में स्थित कान्हेरी बुद्ध गुफा के विश्वविद्यालय से की थी. वे अनागरिक धम्मपाल के शिष्य बन गए थे और बौद्ध धम्म की दीक्षा भी ली थी. किसी भी देश की आर्थिक प्रगति, पुल, इमारतों की निर्मिती और तंत्रज्ञान के विकास का सीधा संबंध बौद्ध सिद्धांतो से है. अशोक के साम्राज्य में जाति विरहित, नैतिक शिलसंपन्न गुणों से परिपूर्ण ऐसा समाज था, जिसका सामाजिक विकास दर ९२% था, जिसे आज 'मानवी विकास दर' (Human Development Index) कहा जाता है. साथ ही दुनिया के अन्य देशों में आर्थिक निवेश ६५% था. सामाजिक और आर्थिक विषमता नहीं के बराबर थी और प्राचीन प्रबुद्ध भारत का साम्राज्य जागतिक (Global) महाशक्ति था. ब्राह्मणों ने अशोक महान के इसी साम्राज्य को 'रामराज्य' कहा है.

सम्राट अशोक द्वारा किये गए मानव और राष्ट्र निर्मिती के आदर्श को याद रखकर प्रतिवर्ष "चैत्र शुक्ल अष्टमी" को बड़ी संख्या में अखंड प्रबुद्ध भारत के साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र में, लोग एक उत्सव का आयोजन करते थे. फाहियान जब भारत आया था तब उसने खुद यह उत्सव देखा था. सम्राट अशोकने सारी दुनिया में बुद्ध के समता, स्वतंत्रता, बंधुता और न्याय के महान संदेशों को ८४००० स्तूपों के रूप में अमेरिका से जापान, इंग्लैंड से आफ्रिका, सभी जगह प्रस्थापित किये थे, शिलालेखों पर खुदवाया और इस प्रकार वह जगत का सर्वप्रथम संविधान निर्माता कहलाया. दुनिया में सभी ओर फैले संदेशों के आधार पर ही इंग्लैंड ने १२१५ में उनका संविधान मग्ना कार्टा (महान संविधान) बनाया, अमेरिका के यूनाइटेड देशों ने १७८७ में उनका संविधान बनाया और अंत में १९४९ में जगत का सबसे विशाल संविधान भारत देश का बना. इन सभी संविधानों में बुद्धसंदेशों के मूलतत्व 'समता, स्वंतंत्रता, बंधुता और न्याय' का मुख्य रूप से उल्लेख है. इतना ही नहीं तो दुनिया में शांतता और न्याय-निवारण के लिए सभी देशों ने संयुक्त रूप से तयार किये गए "संयुक्त राष्ट्र संघ" (UNO) में दुनिया के २९५ देशों में से १९८ देश शामिल है. इस संघटन ने १० दिसंबर, १९१८ को स्वीकार किये 'मानव अधिकार का संयुक्त जाहीरनामा', United Declaration of Human Rights" (UDHR) की उद्देशिका में भी बुद्ध के मानवी मूल्य प्रमुखता से अंकित है. इसका श्रेय अशोक को ही जाता है. इसलिए ऐसे महान राजा की जागतिक स्वरूप की जयंती मनाकर उसके अमूल्य कार्य को याद करना सभी का फर्ज है.

अशोक जयंती "चैत्र शुक्ल अष्टमी" अर्थात तिथि के दिनही मनाई जानी चाहिये, जैसे  किबुद्धजयंती तिथि के अनुसार ही मनाई जाती है. तिथिनुसार कार्यक्रम मनाने के लिए कुछ लोग विरोध करते है कि तिथियाँ ब्राह्मणों की देन है. इस विषय में हमें जानना होगा कि तिथि और कालगणना ब्राह्मण या वैदिकों की देन नहीं है बल्कि यह भारत के विद्वान् भिक्खुओं ने निर्माण की है, जिसके लिए मिस्त्र के खगोलशास्त्र की भी मदत ली गई होगी ऐसा जान पड़ता है. भारत का कैलेन्डर जिसे हिन्दू कैलेन्डर समझा जाता है, वह हिन्दू कैलेन्डर न होकर बौद्ध कैलेन्डर ही है. इसका सबूत मैंने अपने महाशिवरात्रि के बारे में लिखे लेख में दिया है. जिसप्रकार हिन्दू कहे जाने वाले कैलेन्डर में से ब्राहमण 'अशोक विजयादशमी' गायब नहीं कर पाए, उसीप्रकार आज भी उस कैलेन्डर में 'चैत्र शुक्ल अष्टमी' को अशोक अष्टमी कहा जाता है. हिन्दू धर्म यह विकृत बौद्ध धर्म ही है. भारत का तिथि कैलेन्डर यह चंद्रकलाओं की गणनानुसार चलता है. वह अधिक संयुक्तिक है. आज का अंग्रेजी कैलेन्डर जो सेंट ग्रेगोरी ने १५८२ में जुलियन (जुलिअस सीज़र के नामसे ई.पू. ४५) कैलेन्डर पर से तयार किया था. यद्यपि वह कई देशों में माना जाता है, फिर भी दुनिया में सबसे प्राचीन कैलेन्डर जैसे कि बेबोलियन, कोरियन, असीरियन, चायनीज, मिनगाऊ, जापनीस (प्राचीन हान कैलेन्डर), बेनजायटिन, ज्यू (हिब्रू कैलेन्डर) इत्यादि, सभी चन्द्र और सूर्य (पूर्णिमा, अमावस्या दिन) की कालगणना पर ही आधारित है. भले ही, अंग्रेजों ने दुनिया के कई देशों पर राज किये जाने के कारण उन देशों के शासकीय कामकाज में ग्रेगोरियन (अंग्रेजी) कैलेन्डर उपयोग में लाया जाता हो, लेकिन भारत के तरह ही उन देशों में भी रोजमर्रा की दिनचर्या में चन्द्र कालगणना पर आधारित कैलेन्डर को ही प्रयोग में लाया जाता है.

ब्राह्मणों ने इस देश पर राज करने के लिए भारत के हिन्दू और बौद्धों में झगडा लगाने में बड़ी चतुराई से सफलता प्राप्त की है. उन्होंने चालाकी से इस तथ्य को भुला दिया कि भारत के हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई ये सभी बौद्ध ही थे. इतना ही नहीं तो उन धर्मों में घुसपैठ कर उनके धर्मगुरु के पद भी हासिल कर लिए. इसलिए इस सत्य को जानिए और 'तिथियों' की गणना का प्रकार वैदिक है, इसे दिमाग से पूर्णतया हटा दें. ब्राहमणों ने तो भारतीय प्राचीन गणिती पद्धति को भी 'वैदिक पद्धती' के रूप में प्रसिद्द किया है, जबकि वेदों में ना ही पूर्णिमा, अमावस्या के कालगणना का उल्लेख है और नाही किसी प्रकार के गणिती ज्ञान का.

करुणा, सत्य, अहिंसा, इन सभी मानवी नैतिक सभ्य संस्कृति के विचारों को प्रवाहित करने के लिए हमें अशोक जयंती स्वतंत्र रूप से मनानी होगी. जिससे उसके बेजोड़ उदार और सहिष्णु कार्योंकी पहचान देश के प्रत्येक नागरिक को हो. दुनिया के किसी भी राजा की शासन प्रणाली अशोक महान के जैसी नहीं थी. जैसे कि उनका यह आदेश, 'मै चाहे सोया हूँ, घोड़े पर हूँ, खाना खा रहा हूँ, बैठा हूँ, लड़ाई पर हूँ, किसी भी समय, कोई भी सामान्य व्यक्ति मुझसे मिल सकता है'. उन्होंने मनुष्यों के लिए ही नहीं तो प्राणियों के लिए भी दवाखाने बनवाये थे. प्राणियों के लिए दवाखाना खोलने वाला और प्राणीहिंसा बंद करने वाला वह दुनिया का पहला राजा है. रस्ते के दुतर्फा घनी छाया वाले वृक्ष लगाने के साथ ही पीने के पानी की व्यवस्था उन्होंने करवाई थी. बिना कोई लड़ाई किये उन्होंने समता, न्याय, प्रेम, बंधुभाव का राज्य पूरी दुनिया पर कायम किया था. ऐसे पत्रक छापकर जगह जगह बाँटने चाहिए. जिससे लोग इस धरती पर हुए सच्चे राजा और शासनकर्ता को पहचान सके. ऐसा आवाहन करना चाहिए कि "अशोक चक्र हमारे राष्ट्र ध्वज पर है, उसकी चार सिंहों की राजमुद्रा हमारे देश की राजमुद्रा है, उसके प्रशासन पद्धति की छाप भारत पर ही नहीं तो दुनिया के कई देशों के संविधानो पर है. फिर हम ऐसे महान करुणासागर सम्राट का जन्मदिन क्यों नहीं मनाते?" ऐसी जानकारी के पत्रक ब्लिस ने तयार किये है. ऐसे पत्रक हम हिन्दू लोगों के कार्यक्रमों में भी बाँटते है. 

       उनका जन्मदिन इस देश के महान राजा के स्वरुप में मनाया जाये.  देशवासियों से विनती है कि सम्राट अशोक की जयंती "चैत्र शुक्ल अष्टमी" को ही  बड़े ही जोर शोर से और बाजे गाजे के साथ मनाये. रैली निकाली जाये. देश का राष्ट्रध्वज, चार सिंहों की मुद्रा और सम्राट अशोक के बड़े बड़े कट आउट लगाये. रैली का स्वरुप बिल्कुल भी धार्मिक ना हो. भले ही सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया लेकिन उन्होंने मानव ही नहीं तो सारी कायनात के लिए किये कार्य ज्यादा महत्वपूर्ण है. गंगा नदी की स्वच्छता का अभियान भी अशोक महान ने अपने कार्यकाल में शुरु किया था, ऐसा शिलालेखों से ज्ञात हुआ है. रैली में सिर्फ और सिर्फ राष्ट्र ध्वज ही उपयोग में लाये जाए और केवल देशगौरव के गीत बजाये जाए. विशेषत: रंगबिरंगी कपडे पहनकर, सजधज कर रैली में शामिल हो. यह देश का राष्ट्रीय त्यौहार लगे. सम्राट अशोक को किसी एक धर्म का राजा ना प्रदर्शित करते हुए देश में महानतम राजा के स्वरुप में प्रदर्शित करे. बौद्धों ने अन्य धर्मियों का द्वेष त्यागकर बुद्ध और बाबासाहब को लोगों पर जबरदस्ती थोपने की अपनी संकुचित वृत्ती को परे रख संपूर्ण जीवितों के कल्याण के लिए, विचारपूर्वक और संयम से कृतीशील कार्यक्रम अमल करना जरुरी है. इसे ध्यान में रखना होगा कि ब्राह्मणी षड्यंत्रकारी लोग बौद्धों पर अत्याचार करके उन्हें अन्य धर्मियों के खिलाफ भड़काकर उनसे अलग करने की साजिश बखूबी नित्य रूप से अमल करते रहते है, ताकि अन्य धर्मीय और बौद्धों में वैमनस्य बना रहे और बुद्धतत्व प्रचार पर अंकुश लगा रहे. इस सच को समझकर जयंती का उत्सव संभवत: अन्य धर्मियों के हाथों कार्यान्वित किया जाये. उसके लिए उन्हें प्रत्यक्ष मिलकर अशोक के इतिहास की जानकारी देनी होगी. संभव हो तो राजकीय पक्षों को भी, बिना किसी पक्षपात किये शामिल किया जाये.  रैली का उद्घाटन शहर के जिल्हाधिकारी, तहसीलदार, आयुक्त के हातों करें. ध्यान में रखना होगा कि अशोक की जयंती किसी बंद हाल या मैदान में अन्य महापुरुषों के साथ ना मनाएं. अशोक महान की जयंती स्वतंत्र रैली निकालकर ही मनाई जाए, अन्यथा बिल्कुल ना मनाये. बाबासाहब ने कहा है, जो इतिहास भूलता है वह इतिहास नहीं बना सकता. इसलिए इस देश के लोगों को सच्चा इतिहास समझाकर फिर से जम्बुद्वीप का प्रबुद्ध इतिहास प्रस्थापित करना होगा, जिससे ब्राह्मणी जाल में फंसे हुए हमारे भारतीय देशवासियों को बाहर निकालकर 'समता, स्वतंत्रता, बंधुता और न्याय' के प्रेममय मधुर वातावरण में लाया जाए. यह जिम्मेदारी वहन करने की क्षमता बाबासाहब के अनुयायिओं में है. इसलिए इस राष्ट्रीय त्यौहार की तयारी के लिए अभी से लग जाईये और अशोक महान का इतिहास इस दुनिया को जताइए.

डॉ परम आनंद,
विहार सेवक, भारत लेणी संवर्धन समिती (ब्लिस),

८८०५४६०९९९